चाहती थी!
By Shruti Lodha
समंदर के कोल बैठे
उससे कह रही थी
कहना कुछ चाहती थी
सोच कुछ और रही थी
कहने को कहा जब खामोशी ने
तो कहना किसी और का मानना चाहती थी
सोच के कहने में वक्त निकल गया
काश कहकर मैं सब बतला पाती
कहने को पूरी सांझ पड़ी थी
मगर कहने को अब सिर्फ रात की बारी थी
कहना उन लहरों से कि मैं सुनना चाहती थी
अनकही वह बातें कहकर सुलझना चाहती थी
बैठी थी आंख मूंदे शहर के बीच में
कहने को तो मैं समंदर में डूबना चाहती थी
By Shruti Lodha

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