चांदनी
By Anilkumar
आधी रात
उतरी चांदनी
छू गया उसका कोमल स्पर्श
दूर कहीं
रात रानी महक़ी
दो आंखों के बीच
चांद बिचारा कट कर रह गया
आया ,आज फिर
बूढ़ी इमलियों में रस
भर गया
छू गया कोई
मन के तार
अकंवार में उसके बिछ गई धरती
हँस कर दो आंखों के बीच
चांद बिचारा कट कर रह गया
हुई बावली टूटी, गिरी
कली रे सेमल की
सजी धरती पर
हुआ सहज स्पर्श
कचक कर रह गया
बिचारा अमलतास
दो पलकों के बीच
चांदनी गिरी
दो अलकों के बीच
थिर जल कांप गया
दूर कहीं टिटिहि बोली
आया मंद पवन का झोंका
आया, आकर गा गया
गिरी धरती पर
आधी रात की चांदनी।
By Anilkumar

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