चंद लम्हे
By Nisha A Bhagat
दुनिया की दौड़ में दिमाग आगे निकल गया...
दिल ने रोकना चाहा तो उसे झिड़क दिया..
दिल बोला दिमाग से तू चल दुनिया के संग , मैं शाम को तेरी राह देखूंगा...
कई शामें गुजर गई पर कोई दस्तक ना हुई....
एक शाम दिमाग लौटा, थकी आवाज में बोला..
ऐ दोस्त तूने मुझे भुला दिया, एक आवाज ना दी तूने, ऐसा मैंने क्या किया...
दिल बुझी नज़रों से उसे देख मुस्कराया ..
"बारिश में कागज़ की नाव लिए तुझे पुकारा...
तलाब में उतरते हुए हाथ पकड़ने के लिए तुझे पुकारा...
हाथों में पतंग की डोर लिए तुझे पुकारा...
छत पर लेट कर सितारों को देखने की चाह लिए तुझे पुकारा...
कुछ पल मां की गोद में सर रख बिताने के लिए तुझे पुकारा...
कभी बाबा के पास बैठ दो शब्द सुनने के लिए पुकारा...
हर बार पुकारा... बार बार पुकारा..
दुनिया की चमक में तुझे मेरे आंसू ना दिखे...
उसके शोरगुल मे तूने मेरी आवाज ना सुनी..
फिर भी बार बार तुझे पुकारा, मैं कभी ना हारा..."
मै अब आ गया, तेरी हर शिकवा करूंगा दूर, कहा दिमाग ने..
यह सुन दिल ने अपना ज़ख्मी शरीर दिखा कर बोला..
"बार बार अपने टुकड़े समेट कर बिखर गया हूं, उन्हे जोड़ जोड़ कर टूट गया हूं...
अब ना दे सकूंगा साथ तेरा, बस अब बहुत थक गया हूं..."
गोद मे सर रख कर दिमाग के, दिल बोला...
"बस चंद लम्हों की चाह ही तो थी तेरे संग ।।।।"
By Nisha A Bhagat

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