चंचल मेघ काली बदरी
By Vivek Upadhyay
ये कविता एक कल्पना है जिसमे लेखक बरसते मेघ का वर्णन उसको अपने घर के पड़ोस में नीचे रहने वाली मेघा नाम की अपनी प्रेमिका से करते हुए दर्शा रहा है ।
चंचल मेघ काली बदरी,
चंचल मेघा काली बदरी तेज़ हवा बरखा सी घटा,
ऊपर रंग भरे बादल नीचे प्यारे मेघाओं की अदा,
महक उठी धरती हरियाली सी फिजा,
बूंदों को मिला माटी का पता,
मेरे दिल मे भी बरसी बेपनाह बेपरवाह ।
मेघों से बना समन्दर,
रह गयी समा के अंखियों के अंदर,
थमी पलकों मे मेरे बन के हसीन ये मंज़र,
नज़रों से दिल तक, दिल से धड़कनो तक,
आदत सी है, रुह की राहत सी है,
कुछ शरारत सी कुछ शराफ़त सी है,
बिन बोले तेज़ बरसात सी है,
कुछ शोर सी है,
मेरे ओर कि है ,
ये भीगी सी मेघों कि अदा ।
By Vivek Upadhyay

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