घर से क्या दूर हुए
By Dr. Rohit Kumar
बहुत सारे एहसास
न बताये गये - न जताये गये
घर से क्या दूर हुए,
लोगों से मतलबी कहलाये गये… .!
कैसे कहे और किस से कहे
किस उदासियों में हम परदेश में है,
अनजान भीड़ से हम बेवजह सताये गये..!
सन्नाटा सूनापन का ढेर लगा है,
मकान भी बताओ कब कहा घर लगा है
ऐसे कुछ रोचक किस्से यूँ ही भुलाये गये… !
हमारी कोई नई कहानी नही,
शायद दिलो में भी कोई निशानी नहीं
आखो से कुछ आसूं यूँ ही बहाये गये… . !
अपनो से अपनो के लिए ही,
तड़पते थे कल भी और आज भी,
अपनेपन के लिए हम तरसाये गये… .!
बसता है एक शहर मेरे अंदर भी,
मचलता है भावना का समंदर भी,
वेदना हो या संवेदना सब मे हम दफनाये गये… . !
By Dr. Rohit Kumar

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