घर की राजकुमारी
By Vikas Kumar Lodhi
जुड़वा पैदा हुए हम, सबने कहा घर आए है राजकुमार और राजकुमारी|
पर असल में, सबसे आखिरी में आती है मेरी खुशियों की बारी||
लड़की – लड़के सब बराबर है, ये कहते स्कूल में मास्टर जी|
सिर्फ किताब में ही पढा ये, असल जिंदगी में कहां ये हासिल थी||
10 मिनट देर से सोकर उठने पर, घोड़े बेचकर सोने का मिलता है ताना|
और उसे देर तक सोने के लिए, नहीं करना पड़ता है कोई बहाना||
कम rank आने पर, सुनने को मिलता है अपने भाई से कुछ सीखो|
पूरे घर का काम करने के बाद, कैसे और कितना पढ़ती हूं ये भी तो देखो||
मैनें मेहनत की और अगले परीक्षा में उसे कर दिया पीछे|
शहर के किसी बड़े स्कूल में किया दाखिला उसका, कहा तू चिराग है घर का नहीं रह सकता पीछे||
जैसे सेवा अभी कर रही, वैसे ही जिंदगी भर कर सकती हूं|
क्यों पराया धन समझते हो मुझे, घर का चिराग मैं भी हो सकती हूं||
मुझे शाम होने के बाद, घर से निकलने की है मनाही|
और वो रात भर दोस्तों के संग करता – फिरता है मनमानी||
मैने मां से कहा ऐसे बेटों को रख घर के अंदर, तभी हम बेटियां घर से बाहर निकल पायेंगी|
मां ने कहा चुप बेशरम, क्या ससुराल में भी एसे ही जबान लड़ाएगी||
उसने अपने Birthday पे नयी Bike की demand रखी|
वो घर का एक लौता है न, तो उसके demand के आगे मेरी कुछ जरूरतें भी पूरी न हो सकी||
कुछ इच्छाएं मेरी भी है, पर पापा को कड़ी मेहनत करते देख मैने जरूरतों को ही इच्छा बना ली|
घर की एक लौती हूं न, ये सब सोचने की जिम्मेदारी मैने अपने सर उठा ली||
हलषष्ठि में मां और भाईदूज में मैं, व्रत के साथ सजातीं है आरती की थाली|
मैने उसे अपने दोस्तों को देते सुना है मां – बहन की गाली||
सोचती हूँ जन्में है एक साथ, तो मैं ही क्यों झेलूं इतना कुछ|
भाईदूज की ही तरह, वो भी क्यों न मनाए बहनदूज||
इतना सहने की खूबी हममें, इस औरत जात में जनम के साथ मिलती है|
क्या पहले क्या शादी के बाद, हमारी जिंदगी एसे ही निकलती है|
By Vikas Kumar Lodhi

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