गुलाल
By Vasudha
वो भी थे सामने और हम भी थे
आँखों में हया और हाथों में गुलाल थे,
दोनों खामोशी से देख रहे थे एक-दसू रे की ननगाहों में
पर कमबख्त हवा के झोंके ने प्रियतम का काम कर ददया,
िेयसी की आँखों और चेहरे को रंगीन कर ददया,
उस बेचारे हवा की भी क्या गलती थी
वो क्या जाने इन ददलों की बेताबबयों को,
इसे होली का खुमार कहें या इश्क का रंग
जो भी कहें, ददलों की हसरत अधूरी रह गयी
उन्हें गुलाल लगाने की चाहत अधूरी ही रह गयी।
By Vasudha

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