गुलमोहर
By Akhilesh Nawale
पेश है कुछ रिश्ते
डर लगता नही था उनमे बिखरने मे,
समझ जाएंगे चेहरे पे उदासी;
फूलो की तरह लग जाएंगे सिमटने मे.........
पेश है प्यार
बेचैनी सी थी उसमे उलझने मे,
दूर से देखते ही चेहरे पे नूर;
लाली सी है झलकने मे..........
पेश है इंतज़ार
वक़्त ना लगा किसीको बिछडने मे,
दिखना है बस चेहरे से बेफिक्र;
यहा बहारे लग गई है झड़ने मे.........
पेश है अफ़सोस
दिल लगता नही है जख्मो को सिलाने मे,
अकेली शाखो जैसे चेहरे पे खामोशी;
यादे लग गई है रुलाने मे........
पेश है उम्मीद
फ़िलहाल तो गुल है हम किसी पुराने तराने मे,
उसी लाली की लगा दे इस चेहरे पे मोहर;
कोई इस गुल-मोहर को लग जाए अपनाने मे...........
By Akhilesh Nawale

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