गुफ़्तगू
By Shovit Raj
किसी रोज़ तू बस यूँही मुझसे,
गुफ़्तगू करने के लिए आओ!!
कुछ तुम मेरी सुनो ,
कुछ तुम अपनी बातें बताओ!!
मैं ले आता हूँ बचपन के वो
अलहर किससे ,
तू जवानी की वो हसीन
सपने सजाओ !!
कुछ मैं मोहबात की
बातें सुनाऊँ,
कुछ तुम भूली- बिसरी
यादें दोहराओ!!
मैं ले आता हूँ दुनियाँ
के सारे ग़म,
तुम मदिरालय से नशीली
जाम ले आओ !!
कुछ मैं चेहरे पे सब के
हँसी , मुहस्कुराहत ले आऊँ ,
कुछ तुम उम्मीदों से भरी
ये शाम ले आओ !!
मैं ले आता हूँ
नौजवान ही सारी उदासी ,
और तुम बच्चे की
खिलखिलाती हँसी ले आओ!!
कुछ मैं नए दौर के
नए ख़्वाब ले आऊँ ,
कुछ नए मौसम के
नए गुलाब ले आओं!!
किसी रोज़ तुम बस यूँही
मुहसे गुफ़्तगू करने आओ !!
By Shovit Raj

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