गिलहरियां
By Surya Kant Pawar
जिस्म की ज़दों से परे ,
आसक्ति की सरहदों के पार ,
रूह की हदों में,
चलो थोड़ी दोस्ती की मखमली धूप सेकें।
करवट लिए औंधे पड़े रहना तुम मेरे आगोश में ,
और मैं कंघी करता रहूँगा तुम्हें अंगुलियों से,
पड़े -पड़े अंधमुंदी सी अलसायी आँखों से देखना गिलहरियों का खेलना।
सुना है पड़ोस के नीम पर,
रहती हैं दोस्त गिलहरियां दो।
जिस्म के बंधनों से मुक्त।
अल्हड़-अलमस्त-खिलखिलाती-बेपरवाह।
पेट भर दाना-दाना चुनती हैं साथ में।
फिर एक दूजे से रूठने को मनाने को , एक दूजे के पीछे भागती हैं साथ में।
हाथ लगे तो दूजे को लाड़ जताने को सताने को , सहलाती-गुदगुदाती -चहचहाती हैं साथ में।
फिर से दाना चुनती-रूठती-भागती-मनाती-चहकती!
तुम गर सो भी जाओ तो भी मैं सीखता रहूँगा ,
की जिस्म की ज़दों से परे, रूह की हदों में ,
हम भी दाना चुनेंगे -रूठेंगे-मनाएंगे-चहचायेंगे !
कल से हम भी दोस्ती की कुनकुनी धूप में नहाएंगे बेबाक-बेपरवाह !
By Surya Kant Pawar

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