गिरता हुआ पर्दा
By Bhanupriya
हम एक दूसरे के लिए सही नहीं थे। वो सारी कविताएं जो तुम्हारे a मेरी भावनाओ का तुम्हारे लिए..मगर उनके मायने अब बदल चुके है।
अब मैं नदी के उस पार हूँ जहां बस एक वात है जो भरता नहीं है, यहाँ मैंने अपने भीतर डरावनी यादों के ख़यालो से सराबोर गहरा समंदर बटोर के रखा हुआ है, जो के किसी भी रिश्ते को डूबा देने के लिए काफी है.. हमारे इस रिश्ते में अब तैरने की गुंजाइश ख़त्म हो चुकी है...
कोई भी रिश्ता ना तभी तक फिर से पनपने लायक होता है जब तक उसके खत्म हो जाने की पीड़ा को पूरी तरह से जी न लिया गया हो..एक बार उस पीड़ा को जी लिया तो फिर पीछे मुड़ के देखना निरर्थक है। वेदना अपने नियम शर्तों के साथ आती है, विलाप अपने साथ कितनी ही मांगें लाता है और रिश्ते के खत्म होने का संताप चारो तरफ वीराना फैला देता है। फिर वहाँ बचती है एक बंजर उजाड़ ज़मीन जहाँ फिर से उसी पुराने रिश्ते के अमलतास खिलने तो कतई मुमकिन नही होते.. ठीक वैसे ही मैंने भी तुम्हारे मेरे रिश्ते को मरते हुए, या यूं कहो कि मर चुका महसूस किया है.. इसका शोक मैने खुद जीया है और ऐसा रोया है मानो सब कुछ जा चुका है। अब फिर से इस रिश्ते को हरा होते देखना मेरे लिए आसान नहीं है। वैसे भी सालो पुराने सिले हुए रिश्ते जब उधड़ने लगते है तो कोई टांक उनको इतनी खूबसूरती से सिल नहीं पाती जितना खूबसूरत वो पहले थे.. रफू बेशक़ उनको पहले जैसा तो दिखा देता है, फिर टांको का जाला चाहे दूर पास से नज़र भी न आये लेकिन उसकी चुभन और अटपटापन अंदर महसूस होता रहता है, और हमेशा याद दिलाता रहता है के यहाँ एक जोड़ था पहले जो अब उधड़ चुका है। कैसे उधड़ा, कितना और किस किस तरह से... ये सारा कुछ किसी सिनेमा की तरह जेहन के पर्दे पर चलता रहता है हर क्षण। तब तुम पुरानी दरारों में, और पुरानी मेखों की चुभन को जोड़ते जाते हो और फिर बस, कुछ ही समय में सारा का सारा रिश्ता लहूलुहान हो चुका होता है...तार तार एकदम.. उसके चिथड़े समेटने में फिर उम्रे लग जाती है।
जॉन कह के गए है "कौन इस घर की देखभाल करे, रोज एक चीज़ टूट जाती है यहाँ".. हमारे इस घर मे भी सब कुछ टूट रहा है रोज, चंद ही साल हुए है रिश्ते को और ये भरोसे का तार भी टूट गया देखो. प्यार का धागा बचा था आखिरी एक.. और जिस पल ये प्यार ख़त्म होता है, किसी के लिए दम छूटने जितनी पीड़ा देता है, प्राण नही बचते फिर भीतर और महसूस नही होता कुछ और। सुन्न होजाता है सब कुछ, शरीर दिमाग समय सब। लगने लगता है मानो सब रुक गया हो, दिनों ने ढलना छोड़ दिया हो ,रातें सुबह से रूठी है और जीवन एकदम बेज़ार हो गया है। और जिसने ये सब देख लिया उसके सारे प्रश्न फिर बेमायने हो जाते है और उनके उत्तर बीहड़ो में भटक कर खो जाते है, फिर कभी न मिलने को.. हमारा भी ये रिश्ता भटक गया है कहीं अब..हम में से तुम और मैं बच गए है सिर्फ...इसका बोझ हमेशा ढोना होगा। खिले हुए रिश्तों से ज्यादा वज़नी लगते है मरे मुरझाए हुए रिश्तें... लाशों का वज़न अक्सर ज़िंदा आदमी से ज्यादा होता है....।
By Bhanupriya

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