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गांव की वो पुरानी यादें

Oct 28, 2022
2 min read

By Herratdeep Singh


जन्नत की फ़िज़ाओं को देखा है,

हाँ अपने प्यारे गाँव को मैंने देखा है ।।

देखा पुराना घर और घर का सामान भी देखा,

ईंटों, पत्थरों और प्यार से बना मकान भी देखा ।।

और वो मकान बहोत सी यादें छुपाए बैठा था,

सदियों से फीके पड़े अरमानो को वो आज भी सजाए बैठा था ।।

देखा वही पेड़ जहाँ महफ़िल लगती थीं,

गाते थे गीत पुराने और तालीआं बजतीं थीं ।।

पेड़ की छांव भी किसी स्कूल के मेज से कम नहीं होती थी,

जहाँ बैठ कर ज्ञान की प्रापती कुछ कम नहीं होती थी ।।

वो आँगन भी देखा जहाँ घर की औरतें स्वेटर बुना करती थीं,

एक दूसरे की चुगलीआं वो रोज सुना करती थीं ।।

वो आँगन भी तोह लड़ाई और प्यार का प्रतीक था,

जैसा भी था, जो भी था, सब कुछ ठीक था ।।

वो रातें भी तोह याद है जो घर की छत पर गुज़ारी हैं,

उन रातों की यादें मुझे आज तक प्यारी हैं ।।




जुगनूओं को पकड़ने की निरंतर कोशिश किया करते थे,

कोशिश मेहज़ कोशिश रह जाती थी और फिर दुख किया करते थे ।।

तारे गिनने का हुनर हमने बचपन से ही सीख लिया था,

गणित के पहले पाठ का ज्ञान हमने घर की छत से ही तोह सीख लिया था ।।

घर के खेत भी आज कुछ ज़्यादा लहरा रहे थे,

मानो जो उनको हर दिन पानी देता था उसे बुला रहे थे ।।

वो स्कूल भी देखा जहाँ मैं पढ़ा करता था,

सुबह सुबह जहाँ जाने से मैं अक्सर डरा करता था ।।

मास्टर के बड़े-बड़े हाथो का थप्पड़ भी तोह खाया था,

शायद उन्हीं थप्पड़ों ने आज मुझे अफ़सर बनाया था ।।

डांटना और पीटना मास्टरों की आदत सी होती थी,

डांट खाने वाले के लिये वो इबादत सी होती थी ।।

गांव को छोड़ कर शहर आना कोई आसान नहीं था,

अपने परिवार को छोड़ कर जा रहा था मैं कोई नादान नहीं था ।।

शहर जाकर मैंने कमाई का साधन जो जुटा लिया था,

गांव के प्यार और सुकून को जो मैंने लूटा दिया था ।।

शहर आते ही मैंने सांस की शिकायत पाई थी,

गांव की साफ़ हवा के सामने मुझे शहर की हवा कहाँ रास आयी थी ।।

अब अपना खाना रसोई घर में मैं खुद ही तोह बनाता था,

तवे पर रोटीआं पलटते समय मैं हाथ भी तोह जलाता था ।।

सूखी पतली रोटीआं खा कर आनंद कहाँ आता था,

मजबूरी थी खाना खाना वरना कहाँ वो मुझे भाता था ।।

तारे भी तोह देखे मुझे अरसा ही होगया था,

इसी लिए मैं तारों को दीवार पर लगाकर सो गया था ।।

आँख लगते ही मैं अपने गांव की सैर में खो गया था,

गांव पहुँच कर अपनी बूढ़ी माँ की गोदी में सर रख कर सो गया था ।।

आँख खुली और देखा तोह अजीब सा नज़ारा था,

सुबह के आठ थे बज चुके, जल्दी से तैयार होकर मैं दफतर जा रहा था ।।


By Herratdeep Singh





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