गर तू मेरी होती
Updated: Dec 5, 2022
By Khayaal (Motilal Parakh)
गर तू मेरी होती तो क्या बात होती,
कितनी खूबसूरत ये हर शाम होती,
ख़ामोशी होती हर एक अल्फाज़ में,
हर बात आँखों के दरमियान होती।
गर तू मेरी होती तो क्या बात होती।
हर अल्फाज़ में मेरे एक जान होती,
तू मेरे गीतों का सुरमयी साज़ होती,
ये चांदनी शर्मा सी जाए यूँ देखकर,
तू 'मेरे चाँद' वो हसीन मुस्कान होती।
गर तू मेरी होती तो क्या बात होती।
तू एक जलते हुए दिये की तेज आग होती,
मैं तेरी चिंगारी में सुलगती हुई बाट होती,
खुशनसीबी होगी जो मैं जल जाऊं तुझमें,
जीते ना सही, मरते वक़्त तू मेरे साथ होती।
गर तू मेरी होती तो क्या बात होती।
ये तन्हाई मेरी मुझसे दूर होती,
जो तू मेरे लम्हों का नूर होती,
है इश्क चाहे कोई भूल ही सही,
कितनी खूबसूरत ये भूल होती।
गर तू मेरी होती तो क्या बात होती।
मौसम में भी एक हल्की सी बहार होती,
उल्फत में तेरी मेरी खुदी की पहचान होती,
माना काबिल नहीं मैं की तोड़ दूँ चाँद, मगर
बिन कहे बेहिसाब इश्क की बरसात होती।
गर तू मेरी होती तो क्या बात होती।
माना तू मेरी ना होकर भी उतनी ही खास होती,
माना तू इस टूटे दिल के बिखरे से अल्फाज़ होती,
शायरी तब भी तुझे मेरी उतना ही प्यारा कहती,
मगर फिर भी, जो तू मेरी होती तो क्या बात होती।
By Khayaal (Motilal Parakh)

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