गठरी की मुक्ति
By Kapil Sanadhya
किसी अपने की मौत के बाद
इंसान अक्सर कर देता है उसके कपड़ों को पराया
उसे आने लगती है बू उन्हीं कपड़ों से,
जिन्हें शायद खुद खरीद के लाया होगा वो।
शव को तो ले जाता है सजा-धजा के ,
साड़ी कपड़े ओढ़ा के शान से करता है विदा
पर लौटते ही घर पर, जब देखता है,
उन बिस्तरों को
जिसमें तोड़ा था दम उस देह ने,
खीज के बुलाता है महरी को,
सुन री, बना दे गठरी इनकी
और फेंक आ यहाँ वहाँ।
महरी झाड़ू कटके से कहा फुर्सत पाती है
और गठरी को पास के बाड़े में फेंक आती है।
चौक में रखी जाती है शोक सभा,
लोग आते हैं, जताते जाते हैं शोक,
और करते हैं तस्वीर को नमन,
पर बाड़े में रखी गठरी की
कोई नहीं लेता सुध।
फिर एक दिन एक कूड़ा बीनता बच्चा,
देख लेता है उस गठरी को,
खोल कर गांठ, फिर बांध लेता है कस के उसे
कपड़ो का हो गया इंतज़ाम,
जाड़ो का भी बंदोबस्त हो गया
यह सोच के लाद लेता है गठरी को कांधे पे
और ले जाता है घर पर अपने।
फिर मुक्ति के नाम पे मृत्यु भोज
और अस्थि का गंगा में विसर्जन हो जाता है,
पर असल में उस गठरी को,
मुक्ति तो वो बच्चा दे जाता है।।
By Kapil Sanadhya

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