ख्वाहिशें
By Aarushi Sarin
सफरनामा ही कुछ ऐसा है यारों,
किसी से शिकवा भी क्या करें?
सब छूटते रहे और हम चलते रहे,
उन पैरों के निशान ज़ख्म से बनते गए।।
किस्सों में जो कहना चाहते थे हम,
जो बात उनके होंठों पर ढूंढते रहे।
अनजाने में ही सही पर वो राज़ कुछ यूं,
कह गए कि ख़ामोशी में भी चिल्लाहट भर गए।।
उन तस्वीरों को अब क्यों सजाएं?
उनसे मोह हम क्यों लगाएं??
वो एहसास तो वहीं कैद कर दिए हैं,
ऐसी परछाईयों से बात अब हम क्या ही बनाएं??
इन दरवाज़ों की ख़ड़क को अब कौन सुनेगा?
कुंडे खोलने की आस अब कैसे लगाएं??
जिन दहलीज़ो पर हमारा इन्तज़ार हुआ करता था कभी,
वहीं हमारे दस्त-कशी के इंतज़ाम लगाए गए हैं।।
सफरनामा ही कुछ ऐसा है यारों,
यह बुझे हुए दिये अब कौन जलाए?
कौन जलाए?
कौन जलाए??
By Aarushi Sarin

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