ख्वाब
By Sanat Raj
ख्वाब मेरे मुझे घूरे,
बहुत से जो अब भी अधूरे।
कि बह जाऊं नदियां किनारे,
उड़ जाऊं पहाड़ों के सहारे,
देखूं सूरज को समुंद्र में समाते,
पंछियों को अपने घर जाते,
तारों को आसमान में टिमटिमाते,
शहरों को रोशनी से हाथ मिलाते,
झरनों को अपनी राह बनाते,
रास्तों पर हजारों को मुस्कुराते।
कि मेरा घर मुझे पुकारे,
मां पिता के पूरे करने सपने सारे,
खुश करना उन्हें जो है अपने,
पूरे करने उनके भी सपने,
पर कहां ये वक्त कभी रुका है,
कहां किसी के सामने झुका है,
देखो अब समय कम है,
और सूरज हो रहा मद्धम है।
इसलिए मेरे ख्वाब मुझे घूरे,
बहुत से जो अब भी अधूरे।
By Sanat Raj

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