ख्वाइश
By Prashant Vatsa
कभी ख्वाहिश ही नहीं हुई किसी रियासत की पर तुम्हें खोकर ख्वाहिश जागी हैं।
तुम्हें अपनी रियासत बनाने की, खुद को तुम्हारे काबिल बनाने की।
इस जन्म ना सही पर अगले जन्म ही सही तुम्हें पाने की।
कुछ रिश्ते निभाने की,
कुछ कसमें खाने की,
कुछ वादे निभाने की,
तुम में ही डूब जाने की।
By Prashant Vatsa

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