खुदा से गुफ्तगू
By Nitika Soin
तराश उसे और भी, और उसे सवार दे,
सफीना अब ज़िद पे है, मुझे समन्दरों में उतार दे।
नगीना हूँ अगर, तो किसी ताज में न जड़ मुझे,
मुझे और भी खुद पे नाज़ हो, जो फ़कीर की झोली में डार दे।
बेफ़ैज़ सा लगता है ये सहरा का मंज़र भी,
तू खुदा है, नाराज़गी ख़त्म कर, इन फूलों को अब बहार दे।
जो हुआ हो चुका, तेरे फैसलों से मैं गुज़र चुका,
अब न मेरी तक़दीर में, कोई गिरह कोई दरार दे।
मुद्दतों से जो नहीं मिलें, उनसे रहमतों से पेश आ,
रतजगि आँखों को मौला, चैन दे क़रार दे।
तराश उसे और भी, और उसे सवार दे,
सफीना अब ज़िद पे है, मुझे समन्दरों में उतार दे।
By Nitika Soin

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