खुद को सहमत रखना हे
By Kavita Batra
दिल को दिमाग से ही तो सहमत रखना हे।
ज्यादा नहीं तो , खुशी को निराशी से भी तो सहमत रखना हे।
सुरज की किरणो के साथ जागे अरमानो को ,
रात कि चाँदनी के साथ भि तो सहमत रखना हे।
सपनों कि उडान को , हकीकत के कदमों से भी तो सहमत रखना हे ।
ज्यादा नहीं तो , प्रेम को बेमतलब के बन्धन से भी तो सहमत रखना हे ।
यह जीवन के रंगमंच पर हम सब कलाकार हें , रब कि इस रचना में हम को अपने आप को सहमत रखना हे।
By Kavita Batra

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