खिड़की से रिस्ता
By Sasmita Kumari Pradhan
खिड़की में बैठकर बाहर देखने का,
मजा ही कुछ और है ;
दूर से बैठकर बाहर के नज़ारो का ,
आनंद लेना और ;
बारिशो की बूंदों से अपनी कुछ ,
यादों को भिगोना ;
कड़कती धूपो से कुछ ,
खुद को समेटना ;
और दूर से ठंडी हवाओ को ,
आलिंगन कर सहलाना ;
सच में खिड़की से मेरा कुछ ,
अलग ही रिस्ता है |
ख़ामोशी से प्रकृति से बात करना ,
मेरी हर दिन की आदत है ;
सूरज की पहली किरणों की लालिमा से ,
खुद को भिगोने का अंदाज ही अलग है ;
खिड़कियों में बैठी चिड़ियों की मासूमियत भरी हरकतों को,
घंटो घंटो निहारते रहना ;
हवाओं के साथ उड़ती बादलों को अपने दर्द को बहा,
ले जाने की फ़रियाद करना ;
रातों को सुन्न कड़ी टीम टिमाते तारो में ,
माँ को ढूंढ़ना ;
बाहरी दुनिया से चार दीवारों के अन्दर जीने का ,
सच में मजा ही कुछ और है |
चिड़ियों की उड़ान को देख कर अपनी आशाओं को ,
बुनना तो वो मेरा पागलपन है ;
बादलों की आकारों को जानवरो सा कल्पना करना ,
वो भी मेरा बचपना है ;
और तारों के साथ गुमशुम खड़ी माँ साथ बात करना ,
तो आज भी मेरी आदत है ;
शायद यही वजह और जगह है जो मेरा रिस्ता खिड़की से ,
इतना अनोखा और प्यारा है ;
जब चाहा खुद को अकेला किया और जब चाहा अपनी ,
हर ख़ामोशी की हमसफ़र से रिस्ता जोड़ा |
By Sasmita Kumari Pradhan

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