top of page

खिलौनेवाला

May 7, 2023
2 min read

By Yashovardhan Singh

राह में उस रोज़ मैंने एक मुसाफ़िर को देखा।

माथे पर उम्र की सिलवटें और पसीने की रेखा।

भरी दोपहरी में मुस्कुराहट के बग़ीचे सींचा करता है,

खिलौनेवाला है, राहगीरों को खिलौने बेचा करता है।

उसकी पाँव की उँगलियों में धूल कुछ अधिक है।

एक बात तो तय है की ये एक निपुण पथिक है।

एक काँधे पर पूरा मैला सा बसता,

एक भोली सी पर अधूरी सी हँसी हँसता।

बूढ़ी आँखों से सब उम्मीदों का पीछा करता हैं।

खिलौनेवाला है, राहगीरों को खिलौने बेचा करता है।


बाँस की डलिया टँगी है दूसरे काँधे पर।

कुछ धूल सी जमी है टोकरी के बांधे पर।

खिलौनों को सजाए यूँ रह रह कर देखता है,

मानो नीलाम होती उसकी कोई चित्रकारी हो।

हर धूल के कण को गमछे से यू पौंछ देता है,

मानो वो धूल का कण डलिया से भी भारी हो।

मैं सोचता हु यह बेचकर कितना कमा लेता होगा?

कुछ पूरा सा कुछ अधूरा सा घर जमा लेता होगा?

राह चलते कोई आँख-भर क्या देखता भी होगा?

हर नाकाम बिक्री के बाद अपनी कोशिशें समेटता भी होगा।

फिर सोचता हु की शायद पैसे कमाना उसका मक़सद ही ना हो तो?

दो वक़्त की रोटी खाना उसकी अभिलाषा की सरहद ही ना हो तो?

कहीं ख़रीदार के बच्चे की मुस्कान ही ख़ुशामद तो नहीं।

कहीं उसके चेहरे का संतोष भाव ही उसकी आमद तो नहीं।

वो पाँच रुपय का सिक्का झोली में क्या ही भार डालेगा,

वो नन्ही हथेली पर खिलौने का स्पर्श ही उसकी इबादत तो नहीं।

ख़ैर, अब वो ज़रा आगे निकल गया है।

एक बच्चे को रिझाने की कोशिश में लग गया है।

खेद है मुझे कि अपनी जेब से उसकी आमदनी के बीज बो नहीं पाया।

अपने इस चिंतन के बीच उससे वार्तालाप के धागे पिरो नहीं पाया।

अब कल्पना करता हु जो मैं पूछता कि,

“बाबा, क्या करते हो कितना कमा लेते हो?”

वो डलिया की ओर देखता और कहता:

“खिलौनेवाला हु जी, मुस्कुराहट के बग़ीचे सज़ा लेता हु।”’


By Yashovardhan Singh





Recent Posts

See All
Mirrored Truth

By Rufaida Manzoor I stood beside the silent lake, With eyes that felt no urge to break. My hair fell low in shadows deep, The waters...

 
 
 
My Antidote

By Anveeksha Reddy You fill my books with your ink, seeping into the pages bright and brilliant The words etched into the cracks of it,...

 
 
 
Avarice

By Anveeksha Reddy You tear my skin and pick on my bones I label it as gluttony for you Churning and shattering the remains of my...

 
 
 

Comments

Rated 0 out of 5 stars.
No ratings yet

Add a rating
bottom of page