ख़ून और जिस्म
By Debidatta Tripathy
सुनो रंग लाल भी तो,कभी गुलाब और गुलाल होता है,
फिर भी ख़ून देखकर क्यों सबका बुरा हाल होता है।
सोचती है वो लड़की ये बहता ख़ून आखरी हो शायद,
मगर वो ख़ून रिस रिस कर महीना फिर साल होता है।
कुछ सोच कर जो खुदा ने बनाया मेरा उभरता जिस्म,
बताओ बुरी नज़र वालों क्या सच में ये माल होता है।
मोहब्बत हासिल करने का ज़रिया क्या सिर्फ जिस्म है?
आबरू लुटने पर हर लड़की का यही सवाल होता है।
हिफाज़त,इबादत,मोहब्बत न कर सकते हो तो मत करो,
गंदी नज़र,तंज लहजे से सोचो क्या उसका हाल होता है।
जब चादर से लिपटा हुआ बदन आता है माँ के सामने,
रिसते हुए ख़ून से बहते हुए ख़ून का फिर मलाल होता है।
By Debidatta Tripathy

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