क्यों है
By Manish Upreti
लगे से न लगे दिल्लगी जिससे
उससे दिल लगाना क्यों है
नज़रें जिसकी ढूंढा करती हैं किसी और को
उसे नज़र आना क्यों है
हाथ जला बैठे थे जब उस आग से
अब उसे हाथ लगाना क्यों है
कल टूट गया इक घर बनते बनते
अब आज इक घर बसाना क्यों है
अश्कों से जो तेरे नरम ना पड़े
उसे ये घाव दिखाना क्यों है
उसकी मुस्कान से इतना प्यार है
फिर उसे रोज रोज रुलाना क्यों है
जो पास आने की अहमियत न समझे 'मनीष' पास उसके फिर जाना क्यों है
दोस्ती निभाने में दम तोड़ चुके जो
इश्क़ उनसे निभाना क्यों है
इक बार मिली है ज़िन्दगी
बेकार लोगों में गंवाना क्यों है
शायद ज़िन्दगी भर समझ ना आऊं तुझे
खैर अब तुझे समझाना क्यों है
By Manish Upreti

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