क्यूं है।
By Nitish
ये रातों में सड़कें हुई सुनसान क्यूँ है,
यहां आदमी, आदमी से परेशान क्यूँ है,
जिंदगी झूठ के शोर में गुजर रही सबकी,
खामोशी की चीखें सुनाता बस श्मशान क्यूँ है।।
जो गुनाह सबने किए होश-ओ-हवास में ,
तो ये मुट्ठी भर पैसा जिम्मेदार क्यूँ है ,
लुटा दिया मैंने अपना, अपनों पर सबकुछ,
तो बस ये जानवर मेरा वफादार क्यूँ है ।।
महलों में रहकर मुल्क लूटने वाले तक़रीर करते है,
कि ये झोपड़ी में रहने वाले गुनाहगार क्यूँ है ,
अजीब दुनिया को देखे जा रहा 'मुन्तशर',
यहां सबको रुलाने वाले समझदार क्यूँ हैं ।।
हर कोई शरीफ निकला मेरी बस्ती में ,
तो मेरा मयखाना इतना गुलजार क्यूँ है,
दिल तार-तार करने में एक फरेबी का हाथ था,
फ़िर शायरी में मोहब्बत बदनाम क्यूँ है ।।
रोजनामा भरा है कातिलों के कारनामों से,
तो जिसपे बीती वो ही जवाबदार क्यूँ है,
कोई आया, कोई गया, कोई आया ही नहीं ,
ना जाने सबको किसी का इंतजार क्यूँ है ।।
By Nitish

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