क्यूं नहीं!
By Shruti Lodha
सर्दि की छाँव में लो से मेरी मैं खुद की चादर सजाती क्यूँ नहीं ? पवित्र बन सात फैरौं में रंगी चिता की लकड़ीयों से उन चेहरो को हँसाती क्यूँ नहीं ? हाथों में तुम्हारे आँच लगी मेरी मगर खुद को मैं जलाती क्यूँ नहीं ?
धर्म के मोल से बँटी महुरत मेरी इस धूप की छाँव में मेरे लिए हिस्सेदारी क्यूँ नहीं ? डर हर मन में मेरे प्रति तो फिर मेरी एक काया क्यूँ नहीं ? अस्तित्त्व अग्नि मेरा जैसे प्रभावी तो घी एक सहेली की भाती क्यूँ नहीं ?
By Shruti Lodha

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