क्या यही इंसान हैं?
By Jyoti Singh
बेईमानों के शहर में,
खौफ़ में हूं जी रहा
इस खौफ़ में,
ईमान का मेरे बता,
ईनाम क्या है ?
उनको देखो,
जो बैठकर, तख़्त-आे-ताज पर
बड़े ही शौक से,
फरमान जारी कर रहे हैं |
उन काग़ज़ों की भीड़ में,
तू ही बता,
कि अब नया फरमान क्या है ?
बातें बहुत सी हो गईं,
कि हो रही है देर अब ,
तू कह चुका , मैं सुन चुका
इस गुफ्तगू की आड़ में,
अब तो बता ,
कि काम क्या है ?
इज़्ज़त भी झूठी, शान झूठी
ले जिन्हें तुम घूमते हो,
सच तो हर पल मर रहा,
है झूठ की इज़्ज़त बड़ी
पट्टी हटाओ आंख से,
तो फिर दिखे, बदनाम क्या है ?
इंसान भी इंसान अब ना रह गया ,
कहीं बन गया वह जानवर,
कहीं बन गया हैवान है,
और हम यहां, हैरान हैं
क्या यही इंसान हैं?
या फिर,
क्या यही हैं जानवर,
क्या यही हैवान हैं ?
By Jyoti Singh

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