क्या मैं?
By Samya Khan
क्या में ज़िन्दगी जीती जा रही हूं?
दिन में सोचकर , रात में रोकर,
क्या में झूठ में हस्ती जा रही हूं?
किसी को मेरी फिक्र नहीं,
किसी को परवाह नहीं,
किसी को मुझसे प्यार नहीं।
क्या में कुछ ज़्यादा ही सोचती जा रही हूं?
क्या सही है क्या ग़लत, ये समझने की समझ नहीं,
बस जो जी मै आए करती जा रही हूं।
आंखें पोच , चेहरे पर मुस्कुराहट ले कर दुखों पर पर्दा ढक्ती जा रही हूं।
क्या में सच में ज़िन्दगी जीती जा रही हूं?
By Samya Khan

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