कैसे कह दू, के प्यार नहीं ?
By Prachi Kuwatada
कैसे कह दू, के प्यार नहीं ?
प्यार पर भरोसा तब भी था , अब भी है;
बस, अब तुम्हारा ऐतबार नहीं।
धड़कने तेज हो जाती थी,
तुम्हारी कदमो के आहट से ही बस;
एक सदा पर गले लगा लेती थी तुम्हें, अब भी हूँ
बस, अब वो अहसास नही।
दिन की सुनहरी शुरुवात थे तुम,
रात की मधहोशी का जाम;
हर पल, हर लम्हे में थे तुम, अब भी हो,
बस, अब मुझे तुम्हारा इंतजार नहीं ।
जब भी दिया दर्द तुमने,
प्यार में तो चलता है। इस दिल को समझाती थी;
तम्हारा प्यार या मेरा वहम , तब भी था, अब भी है,
बस, अब हम साथ नहीं।
शुरू होती थी हर बात तुमसे,
ख़त्म भी तुम्हीं पर होती थी,
दिल के हर जज़्बात में तुम थे, अब भी हो,
बस, अब वो बात नहीं।
रास्ता थे तुम ,
और मंजिल भी;
माना था तुम्हे हमसफ़र , अब भी है,
बस, अब हाथों में तुम्हारा हाथ नहीं।
हर रिश्ता छोड़ आई थी पीछे ,
सबसे बढ़कर थे तुम मेरे लिए ।
बस थोड़ा कर लेते उन्हें भी अपनों में शामिल,
थोड़ा मान लेते, मुझे भी अपने काबिल,
साथ हो कर भी तनहा थी में, अब भी हूँ,
बस, अब इस तनहाई में सुकून है, दर्द नहीं।
ता उम्र साथ रहने का किआ था वादा,
चाहा था तुम्हे टूट के,
शायद, खुद से भी कई ज्यादा
हर गम हर ख़ुशी में साथ थी ,अब भी होती ,
बस अब वो हालात नहीं।
खुद को कुछ इस कदर ढाल लिए था तुम मे,
तुम तो तुम ही रहे, और मानो में भी तुम!
तुम से में बन ने की उम्मीद न थी कभी,
और न तुम मे ढलने का था गम
बस थोड़ी में, मुझ मे बरकरार चाहती थी, अब भी हूँ ,
चाहे जीना पड़े अकेले ही!
कैसे कह दू, के प्यार नहीं ?
प्यार पर भरोसा तब भी था , अब भी है;
बस, अब तुम्हारा ऐतबार नहीं।
By Prachi Kuwatada

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