कृष्ण की बांसुरी
By Anubha Sinha
इस लोक से, उस लोक तक
कण-कण करे पुकार
हे कृष्ण तेरी बांसुरी
पुनः बजाए वो मधुर धुन
देख तेरी इस धरा को
बिलख उठी है कष्टों से
पाप के बढ़ते अत्याचारों से
गिर पड़ी है दुष्टों के प्रहार से
उठ ना पाती सत्य समाज
हर तरफ होता उसका तिरस्कार
हे कृष्ण तेरी बांसुरी
पुनः बजाए वो मधुर धुन
मानव, मानव हो जाए
अपने अंदर के दानव का करके संहार
चले धर्म के पथ पर ये
हर पग में पहन कर कर्तव्य का सिंगार
छोटों का मान रहे हर पल
बड़ों का सम्मान रहे हर पल
जाति, लिंग का भेद मिटा कर
ऐसा दृढ़ संकल्प मन बना दे
जो युगों-युगों तक बनता जाए
मानवता का सुंदर संरनाद
By Anubha Sinha

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