कुर्सी
By Sunil Tambat
हर कुर्सी की
एक पेहचान होती है |
बाते तो होती होंगी
उनकी बिरादरी मे भी,
जहा हर कुर्सी की
एक औकात होती है |
पलट के रखं देती है तख्तों को,
फिर भी अंजान होती है |
लेकीन जब बन जाती है
सारथी किसी सामान्य की,
तभी तो उस चार पैरो की
असली शान होती है |
By Sunil Tambat

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