कुर्बानी
By Sadhana Joshi
कुर्बान हो गये वे पेड़ ,
जो वर्षों से सजा रहे थे,
पहाड़ी रास्तों को।
देश विदेश के यात्रियों को,
मोह लेती जिनकी खूबसूरती।
जिनकी छांव में कुछ पल,
ठहर जाता लम्बे सफ़र का राही।
मस्त हवा के झोकों को ,
चूमा करती जो पत्तियां ,
लहराती बातें करती,
पूछा करती हाल नानी दादी की तरह।
सहला देती सबका माथा,
दे जाती भावों भरा आशीष,
गंगा की लहरों के जैसी
सभी देवभूमि के राह गिरों को।
कट कर बिखर गये वे वृक्ष,
विकास की राहों में,
विलख विलख कर रोते हैं अब,
टुटती मिटती सांसों में।
गिरकर बिखरी है पत्तियां ,
हिलती है न डोलती है।
हरियाली को त्याग कर वह,
सूखी बेजान दिखती है।
लाखों हाथों की मेहनत लगी,
इन राहों को सजाने में,
आरी बरछे भी कई चले,
जमी पर उन्हें सुलाने में।
तड़पें हूगें वे पेड़ बहुत,
सिर धड़ के कट जाने पर,
कुर्बान हो गये लाखों वृक्ष,
चौड़ी सड़क बनाने पर।
By Sadhana Joshi

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