कुदरत
By Aahish Anilrao Deshmukh
मोर मोरनी संग निकले है सावन में इस कुदरत की
खेलकर मिट्टि धूल गये हम आंगन में इस कुदरत की
सुक्ष्म विक्राल रूप शामिल, अमिबा और हाती देखो
देखो बरसती पानी की बूंदे और बागे लहराती देखो
इंद्र सूर्य का युद्ध चल रहा फिजाए उमंगी है
कुदरत की चुनरी देखो कितनी सतरंगी है
फूलो के खातिर तितली प्रेम पत्र बन जाती है
डाकिये का कृत्य कर परम मित्र बन जाती है
सावन से प्यास बुझाए, कुदरत सावन में नहाकर
जैविक सृष्टी को जीवन दे, घाटो से दरीया बहाकर
स्थल और वायू में रूप भिन्न ये कुदरत की किमया है
बादल बरसकर जो समंदर तक पहुचाएं वह दरीया है
चट्टानो से लढकर निरंतर आगे बहना दरीया है
पर्वत से उतरकर झिल में गिरता झरना दरीया है
पंचमहाभूतो से निर्मित कण कण में समाई कुदरत है
सिर्फ कुछ अंश है हम इसके, हमारी माई कुदरत है
ध्रुव का पिघलता हिम और बढती सागर की उंचाई
अॅमेझॉन का जलता जंगल, बढती कुदरत की गरमाई
धुम्रपान कारखानो का और आग लगी है जंगल में
पृथ्वी का भविष्य देखो आसमां के लाल मंगल में
पंछियो सें छत छिनकर अपने घर बनाते चलो
जंगल को विरान बनाकर और शहर बनाते चलो
घुसपैठ हमारी सागर में पलपल यूं जारी है
भितर त्सुनामी पाले बूँद बूँद अब बाघी है
तंत्रज्ञान का खाद मिला नोटो वाली फसलो को
नॉस्टालजिया दे रहे हम आने वाली नस्लो को
दुषीत हवा में घूंटती सांसे और घूंटते हुए जज्बात है
बोलबाला जिडीपी का, खैर! कुछ दशको की बात है
मां वसुंधरा जकडी है सरहदो के जाल में
आक्रोश देखो जरा ज्वालामुखी भुचाल में
बोलो क्या जी पाओगे अपनी अमानत झोंककर
खुदको बौना पाओगे कुदरत की दानत देखकर
सर्वनाश का बिगुल सुनकर अब भी संभल सकते हो
बडे भाई माफिक सबका हाथ पकड चल सकते हो
कुदरत तो रास्ता ढूंड लेगी तुम किस ओर जा रहे हो
अरे! जंगल काटकर अपनी ही अर्थीया सजा रहे हो
By Aahish Anilrao Deshmukh

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