कुटिया
By Kunal Verma
दिल दुनिया से परे एक दुनिया बसाई हैं,
यहां मैंने ख्वाबों की लकड़ियों से घर बनाया हैं,
कोने में तरन्नुम और शब्दों का इक गुलदान भी हैं।
खिड़की खोलूँ तो मुझे पुकारने किरणों की गरमाहट आती हैं,
इठलाती-बलखाती हवाएं भी साथ लाती हैं,
अपनी शीतलता से, अपनी निर्मलता से,
आंगन के झूले में, अपने झोंकों से, मुझे बहलाती हैं,
आई उस दुनिया से, समेटी हर कड़वी बातें छोड़,
इस दुनिया के मीठे झरनों, पतझड़ और बुलबुलों की बात सुनाती हैं,
मुझे उस दुनिया, के उस शोर से, हर दिन, दूर ले जाति हैं ...
जब आता हूं मैं इस घर,
तो मेरी यादें मेरे लिए, दरवाजे खोले इंतजार करती हैं,
मेरे जीत और हार, दोनों को याद कर,
मुझसे वह भी ढेर सारी बातें करती हैं,
फिर एकांत की सीढ़ियां चढ़ कर,
मेरी उंगलियों में अपनी उंगलियां पिरो कर
ले जाती हैं अपने साथ अपने कमरे में,
सजा रखा है उसने भी, बत्तियों और महकती मोम से हर कोना,
क्योंकि उसे भी नहीं पसंद हैं, अंधियारी में मेरा अकेले रोना,
वह यादें हैं न, मेरी कमजोरियाँ जानती हैं,
इसीलिए मेरी ताकतों को गुदगुदा कर मुझे हसाती हैं,
मुझे उस दुनिया, के उस शोर से, हर रात, दूर ले जाति हैं ...
दिल दुनिया से परे, इक दुनिया बसाई हैं ...
By Kunal Verma

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