कुछ समझ नहीं रहा
By Bhagyashri Babanrao Ghuge
कुछ समझ नहीं रहा... आग है सामने या धुआँ ?
कोशिश करना तो जैसे भूल ही गया ये तन,
बेफ़िज़ूल की चीज़ें क्यों जकड़ रही है मन ?
कुछ समझ नहीं रहा.... मंज़िल है सामने या ज़ंजीर है ?
कुछ ना कुछ तोड़ रहा है रोज़,
ज़ंजीरें ये बर्बादी की फैलाती हैं खौफ़ ।
कुछ समझ नहीं रहा... ज़िंदगी दिन है या दीन ?
रुके कदम, बर्बादी रोकें है या मंज़र?
बदल गए ख़्वाब तो चुभ रहा है खंजर ।
कुछ समझ नहीं रहा..गलत हूँ मैं या गलती बन गई हूँ ?
किन चीज़ों में उलझ रही हूँ ,
अकेली ही डगमगाती, बस भटक रही हूँ ।
कुछ समझ नहीं रहा... ख़्वाब बड़ा या लक्ष्य ?
जो ख़्वाब ही नहीं था वो लक्ष्य बन गया,
जो ख़्वाब था पुराना वो पुराना रह गया ।
कुछ समझ नहीं रहा..
रुकें कदम, पीछे हटाए तो रोक पाएँगे बर्बादी?
या दूर कहीं मंज़र खो जाएँगे?
By Bhagyashri Babanrao Ghuge

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