कुछ मैं रख लूंगी
By Nidhi Pant
कुछ तुम रख लेना, कुछ मैं रख लूंगी । चाय की चुस्की के साथ बारिश
की कुछ बूंदें,। ढलते सूरज की चेहरे पर पड़ती लाल रोशनी, कुछ
तुम रख लेना,कुछ मैं रख लूंगी। अपनों का साथ, कभी अकेलेपन का
एहसास, घर से दूर शोर करती रेलगाड़ी की आवाज़, कभी
ख़ामोशी में साथ देती सांसों की आहट,। कुछ तुम रख लेना,कुछ मैं रख लूंगी।
बच्चों को देख बचपन को फिर लौट आता देखना, उसी पल बड़े होकर सीमाओं का बंधन।
खिड़की पर रखे हुए गमले में फूल खिलता देखना, क्षण भर बाद उसका मुरझा जाना।
इसी तर्ज पर चलता है जीवन। इसी ताने बाने के बीच कभी
रोकर टूटे हुए मन, कभी खुशी में फिर जुड़े हुए मन का एक हिस्सा तुम रख लेना,एक
मैं रख लूंगी।
By Nidhi Pant

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