कुछ दोस्त छोड़ आया हूँ !
By Gopal Ahir
आ गया हु इस ज़िंदगी की दौड़ में अकेला,
मेरी कुछ कीमती चीज़े भूल आया हूँ,
किसी पने में कुछ ऐसा ही था लिखा,
कुछ दोस्त छोड़ आया हू।
चाय की तलाश में हूँ,
इन्शान वाली चाय छोड़ आया हूँ,
अब तो बस यह लोहे की एक मशीन है,
मेरे दोस्त के हाथ की चाय छोड़ आया हू।
जीना तो मुझे वहा आता था,
यहाँ तो बस ज़िंदगी गुजार रहा हूँ,
शाम तो वहा होती थी,
यहाँ तो बस राते जाग रहा हू।
रास्ते वहा भी खाली थे ,
फिर भी अकेला नहीं था में ,
भीड़ के बीच हूँ में खड़ा,
फिर भी अकेला सा जिये जा रहा हूँ।
अब बारिश नहीं सताया करेगी,
एक छाते के अनेक बटवारे नहीं होंगे,
खाना क्या खाना है? ऐसे कोई सवाल नहीं होंगे,
रात को आखिरी मेट्रो लेने के बहाने नहीं होंगे।
हमारी महफ़िल थी,
हवा में सुकून था,
बहुत सारे सपने थे,
और कुछ मेरे हमसफ़र थी।
वादा रहा इस मंज़िल से,
वापस लौट के ज़रूर आऊंगा,
इस बार जिस चीज़ की कमी थी,
वो सब मेरे साथ लेके आऊंग।
इंतज़ार करना वही,
जब हवा अपना रुख बदले,
समज जाना की महफ़िल जमने वाली है,
फिर उसी जगह दावत लगने वाली है।
By Gopal Ahir

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