कुछ ग़लत कहा बंधु !
By Rashmi Prabha
हमें पता है हमारे अंदर का शैतान कहां है,
उसकी क्षण क्षण की योजना क्या है !
तो बेहतर यही होगा कि अपने भीतर उतरा जाए,
अपनी विस्तृत व्याख्या की जाए !!
जितनी निष्ठा से हम कुशल वक्ता बनते हैं
संयम,सद व्यवहार, ईमानदारी,
पाप-पुण्य की बातें करते हैं
किसी विशेष व्यक्ति की धज्जियां उड़ाते हुए
अपना व्यक्तिगत फ़रमान हवा में ही सही
- जारी करते हैं,
संबंधों की गरिमा से बाहर निकलकर
चीखते हैं,
अपशब्दों का प्रयोग करते हैं,
अनुचित कहते जाते हैं,
उस वक्त हम क्या होते हैं ?!
बड़ी से बड़ी ग़लती पर,
जिसका सद्ज्ञान बखूबी हमें है,
- हमारे माता -पिता ने हमारी धज्जियां नहीं उड़ाईं,
अगर जोर से डांटा
तो रात गए सिरहाने बैठकर सर भी सहलाया,
गले से लगाया
और औरों को ताकीद की
कि अब इस बात पर कोई बात नहीं होगी !!!
यही हमने अपने बच्चों के साथ किया..
हमारे माता -पिता क्या हर मोड़ पर सही रहे ?
लेकिन दूसरे से उनके बारे में हमने कुछ नहीं सुनना चाहा ...
हमने अपनी गलतियों पर पर्दा डालने के लिए
सौ सौ ड्रामे किए
और उस पर अबोध उम्र की मोहर लगा दी
और निश्चिंत हो गए कि कुछ ग़लत नहीं था !
क्या सच में कुछ भी ग़लत नहीं था ?
हम इकट्ठे गहरे उतरेंगे भी या नहीं - इसमें संशय है !
फिर जिससे हम मिले ही नहीं,
जिसका दोनों पक्ष नहीं जानते हैं,
उसके प्रति हम अपनी पसंद, नापसंद जाहिर कर सकते हैं,
अनुमानित कच्चे चिट्ठों का सवाल -जवाब किससे ?
और क्यों ?
अपने बंद कमरे और बंद दिमाग की असलियत
जब हमने नहीं सुनाई
तो निष्पक्षता रही कहां !!!
कुछ ग़लत कहा बंधु ?
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By Rashmi Prabha

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