कुछ खुदसे बातें
By Sanchita S K Behera
काफ़ी वक्त के बाद आज मिले हो ना तुम खुद से?
काफ़ी बार गीरे, पर क्या खूब संभाला तुमने ख़ुदको,
मिले हुए तो खुद से तुम्हें अर्सा हो गया है,
की याद भी नहीं आखरी बार कब मिले थे तुम खुद से।
वह तुम्हारा हर बात पर मुस्कुराना,
बेवजह ही किसी के मुस्कुराहट की वजह बन जाना,
समझना हर किसी की बात को,
इतमीनान से उनकी बातें सुन हाल उनका समझ जाना।
काफ़ी सुलझे से थे तुम,
बस कुछ नादान थे।
यूं ही किसी ने अच्छे होने के दावे किए और तुम मान गए।
सोचा भी नहीं तुमने,
की तुम बहक गए या फिर बहकाए गए।
फिर वह पूरे झगड़े, आधी बात,
अधूरे सपने और पूरी रात।
जानना ज़रूरी था तुम्हारे लिए,
की तुम मंजिल तक पहुंचे हो,
या फिर तुम्हे वहा पहुंचाया गया।
वो मंजिल थी भी या नहीं।
चलो इन बातों को भी जानें देते हैं......
आख़िर, नकाब पहने प्यार के वह बैठे थे तुम्हारे इर्द गिर्द,
तुम ख़ुदको संभालते तो भी कैसे?
कौन सही कौन गलत यह पहचानते भी तो कैसे?
माना की देर लग गई तुम्हें उन दीवारों से बाहर निकलने में,
ख़ुदको संभालने में,
कोई किसी के सहारे उठे तो उसे उठने में कम वक्त लगता है,
अकेले उठना चाहो तब काफ़ी वक्त लगता है।
जो हुआ सो हुआ,
चलो माजी को माजी रहने देते हैं,
तू पंख तो फैला मंजिल के तरफ,
परिंदे अपनी पहचान उड़ान से बताते हैं,
इतने हल्के में जो ले रही हैं ज़िन्दगी तुझे,
उसे भी काफ़ी कुछ बताना बाकी हैं।
उसने तो अभी तक सिर्फ तेरे पंख देखे है,
उसका अब भी तेरी उड़ान देखना बाकी है।
By Sanchita S K Behera

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