कीमती ख़्वाब
By Aditya Mishra
पूरी मेरी नींद में आधा जाग गया था मै,
जूते उतार अपने घर से भाग गया था मै,
जैसे ही मेरे स्वप्न मे तेरा वो चेहरा आ दिखा
रास्ता खत्म हो गया, मंज़िल बिना मैं जा रुका ,
इस स्वप्न की मिठास की तरह कहीं कोई मिठास नहीं
रुकना मुझे नही था लेकिन आँचल का मेरे निवास सही
जागता तो मैं रोज़ हूं, तेरा जगाना जैसे बात नई
उठना मुझे नहीं था लेकिन, स्वप्न का तेरे बहाना सही
इस नींद हराम बिस्तर को दरजा-ए-जन्नत देदो कोई
इसपर अकसर मुझे उसके ख्वाब आया करते है
छटपटाती करहराती सी ज़रा सी आती है नींद
लेकिन नींद ऐसी जिसके टूटने से हम डरते हैं
टूट फिर भी गई अगर तो, समेटकर उस नींदे के स्वप्न सभी, उन्हे यादों के बेशकीमती बक्से में हम भरते हैं
और फिर उस सपने के पिटारे को दिल से लगाकर अपने हम,
जहान मे घूम घूमकर कसीदे तेरे पड़ते है ...
ओ मेरी हुसना, तेरे ख्वाब का देख इतना असर
सोचइकदफा, तेरीदीदकोकितनाहमतड़पतेहैं।
By Aditya Mishra

Comments