*किसी का आना बाकी है*
By Akansha Niranjan
जब सब छूट सा गया था,
जब सब टूट सा गया था ।
कुछ धुंधले हो गए थे सपने,
कुछ रूठ गए थे अपने ।
मंजिल कहीं दूर जाती जा रही थी,
रेत की तरह फिसल रही थी ।
डूब रही थी घोर अंधकार में,
लेकर आंसूओं को अपने दामन में ।
मेरी अनगिनत आसफलताओं पर,
छोड़ा साये ने भी साथ को रोकर ।
हो गया था मन मेरे आत्मविश्वास का भी,
इस दौड़ती भागती दुनिया में कहीं ।
इन उलझे हुए धागों की तरह,
उलझती जा रही थी जिंदगी ।
मुस्कुरा रही थी मुझ पर,
दूर खड़ी मेरी मुस्कान भी कहीं ।
समय बीतते समय नही लग रहा था,
सब कुछ पलों में बदल रहा था ।
बस ठहर गई थी मैं,
कुछ बिखर गई थी मैं।
लेकिन शायद कुछ अच्छा होना बाकी था,
या किसी का आना बाकी था।
दस्तक तो उन्होंने दिल पर दी थी,
पर उन्हें कहाँ पता आज जिंदगी,
फिर गाते हुए झूम रही थी।
सपनों ने फिर उड़ान भरना चाहा,
मंजिल ने भी कुछ पास आना चाहा।
जलाकर दीप आशाओं के,
सजों दिए पल खुशियों के।
तो क्या हुआ छोड़ दिया साये ने भी साथ को मेरे,
परवाह नही जब थामा उन्होंने हाथ को मेरे ।
ढूँढ़कर लाए उस आत्मविश्वास को वही, जो गुम हुआ था अंधाधुंन दौड़ में कहीं ।
सुलझा दिया हर मुश्किल को मेरी,
या साथ निभाया कठिनाइयों में भी
वो मुस्कान तो आज भी,
मुझ पर मुस्कुरा रही थी ।
पर मैं उनके साथ,
खिलखिला कर हँस रही थी ।
हां ये सच है कि,
समय बदलते समय नही लगता,
सब कुछ बदलते एक पल नही लगता ।
शायद उस बदलते पल में, कुछ अच्छा होना बाकी है,
या किसी का आना बाकी है।
By Akansha Niranjan

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