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किसान - कर्ज में डूबा भगवान

Dec 24, 2022
1 min read

By Gopalaram Dheru


एक खुशहाल चेहरे का नाम है-किसान,

या फिर कहीं खेतों में चलता फिरता भगवान है-किसान,

संपूर्ण देश के लिए अन्नदाता है-किसान,

धरती को चीरकर उसमें बीज बोता है -किसान,

एक उत्सव सा छा जाता है उसके आंगन में फसलों के लह-लहाने सें,,

केवल रोजी रोटी के लिए नहीं अपने बच्चों के लिए कमाता है- किसान,

उसका खून, पसीना बनकर चोटी से एडी तक आता है,

कर्ज लेकर एक बेटे को पढ़ाता है -किसान,

सूदखोर का ब्याज भी भरता है -किसान,

कर्ज में होते हुए भी एक बेटी के हाथ पीले करता है -किसान,

हर एक छोटी सी खुशी को बांटता है -किसान,

पर इन सबसे परे जिंदगी का असली इम्तिहान भी देता है -किसान,

बेटी जिसकी प्रताड़ित होती है हर रोज दहेज के लिए,

बेटा उसका जब फीस मांगने से कतराता है,




तब तिल-तिल कर रोता है -किसान,

अकारण ही जब कुदरत का कहर टूट पड़ता है उस पर,,

तब लगता है भगवान भी नहीं है -किसान ,

सिर्फ एक फसल नहीं होती है नष्ट उसकी,

मर जाते हैं सपने उसके,,

इस तरह सूदखोरों और सरकार के कर्ज में फंस जाता है -किसान,,

सिर्फ कर्ज नहीं वह एक चक्रव्यूह है,

जिसमें अभिमन्यु बन जाता है -किसान,,

इतना भी आसान नहीं होता, खुद को मार लेना,

जब सब मर जाता है, तब फांसी पर लटकता है- किसान,,

शायद वो निष्प्राण रस्सी भी रोती होगी,

शायद उस ईश्वर के आंसू छलकते होंगे, जब वह पत्तन अपने एक रूप का पाता होगा ।।।


By Gopalaram Dheru









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