किसान - कर्ज में डूबा भगवान
By Gopalaram Dheru
एक खुशहाल चेहरे का नाम है-किसान,
या फिर कहीं खेतों में चलता फिरता भगवान है-किसान,
संपूर्ण देश के लिए अन्नदाता है-किसान,
धरती को चीरकर उसमें बीज बोता है -किसान,
एक उत्सव सा छा जाता है उसके आंगन में फसलों के लह-लहाने सें,,
केवल रोजी रोटी के लिए नहीं अपने बच्चों के लिए कमाता है- किसान,
उसका खून, पसीना बनकर चोटी से एडी तक आता है,
कर्ज लेकर एक बेटे को पढ़ाता है -किसान,
सूदखोर का ब्याज भी भरता है -किसान,
कर्ज में होते हुए भी एक बेटी के हाथ पीले करता है -किसान,
हर एक छोटी सी खुशी को बांटता है -किसान,
पर इन सबसे परे जिंदगी का असली इम्तिहान भी देता है -किसान,
बेटी जिसकी प्रताड़ित होती है हर रोज दहेज के लिए,
बेटा उसका जब फीस मांगने से कतराता है,
तब तिल-तिल कर रोता है -किसान,
अकारण ही जब कुदरत का कहर टूट पड़ता है उस पर,,
तब लगता है भगवान भी नहीं है -किसान ,
सिर्फ एक फसल नहीं होती है नष्ट उसकी,
मर जाते हैं सपने उसके,,
इस तरह सूदखोरों और सरकार के कर्ज में फंस जाता है -किसान,,
सिर्फ कर्ज नहीं वह एक चक्रव्यूह है,
जिसमें अभिमन्यु बन जाता है -किसान,,
इतना भी आसान नहीं होता, खुद को मार लेना,
जब सब मर जाता है, तब फांसी पर लटकता है- किसान,,
शायद वो निष्प्राण रस्सी भी रोती होगी,
शायद उस ईश्वर के आंसू छलकते होंगे, जब वह पत्तन अपने एक रूप का पाता होगा ।।।
By Gopalaram Dheru

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