किसान
By Shaily Singh
परचम का निशाना भेदने निकला जो,
उस देश का तीर-कमान हूं मैं ।
जो काले में भी हीरा हो,
उस कोयले की लुटी खदान हूं मैं ।
मां की मिट्टी को दुलारता,
सिंह, कौर और ख़ान हूं मैं ।
डॉक्टर और टीचर तो बन जाते हो तुम,
लेकिन इस देश का प्रधान हूं मैं ।
कश्ती लेकर उस पार जाना आसान होगा शायद,
यहां हर लहर तोड़कर, सहारा देता चट्टान हूं मैं ।
जिस कर्ण से उसका कवच मांगा था तुमने,
वैसे दानवीर कर्णों का खानदान हूं मैं ।
दफ़्तरों में बैठकर हरे-नीले काग़ज़ कमाते हो तुम,
पर तुम्हारे दिन के दो वक्त का खान-पान हूं मैं ।
वज़न बढ़े तो घबराते हो तुम,
और तुम्हारे पेट का भार उठाने वाला शक्तिमान हूं मैं ।
जिस दिन में जी भर कर जी लिए तुम,
उस दिन की थकी हुई शाम हूं मैं ।
कैसे कहूं, क्या कहूं, किसे समझाऊं अब,
जीवन के खेत में लहू-लुहान हूं मैं ।
सोने पर राज तुम्हारा है,
और लंका-पुरी का राम हूं मैं ।
न राजा, न रंक, न मंत्री, न संत,
तुम्हारा अन्नदाता, किसान हूं मैं !
By Shaily Singh

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