किन्नर की ज़ीस्त (जिंदगी)
By Vipul Jain
पेट में जब मां के आई थी ,
परिवार में अनेक खुशियां छाई थी ,
जोश ए उमंग से सारा घर सजाया था ,
फिर मेरे आने से सन्नाटा छाया था ।
बेटे के ख्वाब बूंद बाप सोया था ,
बेटी की उम्मीद से बीज बोया था ,
सुबह उठा तो होश अपना खोया था ,
किन्नर के रूप में अपना अंश पाया था ।
एक झलक में खुशियां उझड़ गई ,
मां , बाप के गले लग सिमट गई ,
रोई इतनी के तबीयत बिगड़ गई ,
एक बच्ची किन्नर कैसे बन गई ?
परिवार में बहुत घृणा बढ़ गई ,
यह कर्म जाहि किस पाप को जन्म दे गई ,
मां अपना दर्द सारी उम्र सह गई ,
यह औरत किसी तरह जिंदा रह गई ।।
हर जगह लोग मुझसे दूर भाग रहे थे ,
तो कोई अलग अलग नामों से बुला रहे थे ,
परिवार में कोई मुझसे नही बतला रहे थे ,
तो कोई मुझे कमजोर बता रहे थे ।
परेशान होकर घर से दूर निकल गई ,
तो घरवालों की परेशानियां थम गई ,
ताली बजा कर किन्नरों संग चल गई ,
इसी के साथ नरक भरी जिंदगी बन गई ।
एक आम इंसान हिंजरा बन गया ,
परिवार का सपूत कपूत बन गया ,
परिवार से दूर एक नया परिवार बस गया ,
ताली बजा जिंदगी का पहिया निकल गया ।
By Vipul Jain

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