कि हस्ती मिटती नहीं हमारी (विमेंस डे)
By Seema Sharma
कभी सोचती क्या ये वाक्य मेरे लिए हो सकता है?
और सोचती कौन हूं मैं?
क्यों हूं मैं?
क्या हूं मैं?
कुछ हूं क्या मैं?
है क्या मेरा?
क्या सवेरा मेरा?
क्या ये चांद मेरा?
क्या ये बेटा मेरा?
क्या ये भाई मेरा?
और क्या ये सफर मेरा?
क्या ये किनारा मेरा?
क्या है मेरा?
क्या मैं मेरी?
क्या मैं किसी की?
क्या मैं किसी की नहीं?
क्या मैं कुछ भी नहीं?
क्या है मेरा अस्तित्व?
मेरा स्त्रीत्व?
मेरा मातृत्व?
मेरा नारीत्व?
मेरा दायित्व?
क्या है?
हां है
कुछ तो हूं मैं
परन्तु कब
तब, जब
नबने को तैयार मैं,
झुकने को तैयार मैं,
सुनने को तैयार मैं,
खुद झुककर, दूसरे को झुकानें को तैयार मैं,
और अपनी हस्ती मिटाने को तैयार मैं।
और तब मैं बन जाती
इस घर की धुरी,
सबकी खुशियों की परी,
सबकी पलकों की नमी,
सबकी हसरतों की लड़ी,
और मैं खड़ी ताकती,
अपनी ही हस्ती।
हां मेरी हस्ती
मैं ही हूं इस घर की मस्ती,
इस घर की हस्ती,
है मेरी ही सृष्टी,
मुझी से मस्ती,
मुझी से रूह इस घर की,
मैं हूं ताकत सबकी,
अपने आप की,
और दूसरों की भी।
और फिर मैं सोचती
यही है नियति मेरी,
जो कुदरत ने मुझे दी।
पहचाननी होगी
मुझे वो शक्ती
नारीत्व की,
ममत्व की,
दायित्व की।
तभी तो मैं कह पाती
और गर्व से बता पाती
कि हस्ती मिटती नहीं हमारी,
कि हस्ती मिटती नहीं हमारी,
कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।
By Seema Sharma

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