कालेज एक घर
By Parul Rathee
बस उन्ही कालेज के दिनों में खोई है वह,
जब दिन ढल जाता था,
डिपार्टमेंट बन्द हो जाता था,
पर काम ना रुक पाता था।
चौकीदार आकर भगाता था
"बस थोडी देर और भैया"
कह कर वहीं रुक जाना था।
रात को माँ पापा का फोन आता था,
तो याद आता था,
"अरे! घर भी तो जाना था।" ।
निकलती रात को
तो सुनाई देता था, बिना गुरू और दोस्तों के ,
कालेज में कितना सन्नाटा था।
उस गली अब ना जाना होता है,
याद आए तो दिल खुद को समझा लेता है,
"क्या समय को भी आजतक किसी ने रोका है?"
समय के साथ सब बदल गया वहाँ,
चार दीवारी तो सिर्फ़ एक धोखा है ,
अपनो के बिना घर कहाँ,
वीराना सब होता है।
By Parul Rathee

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