काली ज़िंदगी
Updated: Jul 21, 2025
By Sakshi Kumar
अजनबी सी लगने लगी है यह ज़िन्दगी...
मंज़िल का न पता है और ना खुद की खबर है
अपने करीब है मगर फासले बड़ने लगे हैं
कुछ खोया हुआ है, ना जाने क्या है
एक खालीपन सा है मगर महफिलें सजी हुई है
होठों पर नंब नंब हंसी सी है और ऑंखों में नमी सी है
अक्सर बातें करती हूं, ना जाने किससे करती हूं
आजकल शोर बहुत है मगर तन्हाइयों से ईश्क हो रहा है
बहुत कुछ बदल रहा है मगर मैं वहीं ठहरी हूं
लगता है ख्वाब देख रही हूं, ना जाने किसके देख रही हूं
By Sakshi Kumar

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