कागज़ की कश्तियाँ
By Anisha
कागज़ की कश्तियों में तैरती ज़िंदगी,
किनारा पाने को बेताब हो रही है।
कुछ तो है जो बदल रहा है,
एक पन्ने की ज़िंदगी आज किताब हो रही है |
खोया हुआ-सा कुछ मिल गया है,
कुछ मेरा था जो अब खो गया है।
कोई ठिकाना पाने को बेचैन है ज़िंदगी,
सफ़र करते हुए इसे बहुत वक्त हो गया है।
By Anisha

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