कांच की चूड़ियां
By Sonal Mathur
अब कहाँ रहा फैशन कांच की चूड़ियों का,
खनकती, बोलती, चहकती चूड़ियों का।
रंगों को कपड़ों से मैच कराती,
नहीं दिखती चूड़ियां अब चमचमाती।
कहाँ गए वो हाथ जो भरे रहते थे,
कांच की चूड़ियों से सजे रहते थे।
आहट ही काफी थी मां की चूड़ियों की,
थम जाती थी वहीं शैतानियां सभी की।
साजन के मिलन की आस थी,
चूड़ियां ही तो सोलाह श्रृंगार थीं।
निकल पड़ते थे हाट जाने को,
सैरसपाटा और नई चूड़ियां लाने को।
छोटे-बड़े, जवान-बूढ़े सभी की मुस्कान थी,
कांच की चूड़ियां नहीं, यह सबकी पहचान थी।
दौर गुज़र गया कांच की चूड़ियों का,
रह गया साया कीमती सोने-चांदियों का।
अब गालियों में मनिहारों की पुकार नहीं,
सब ऑनलाइन है, किसी को किसी से सरोकार नहीं।
कांच के रिश्ते हैँ, झट से टूट जाते हैँ,
गहने नहीं, अब जस्बात कांच में तोले जाते हैँ।
कदर ही कहाँ रह जाती, कांच की चूड़ियों की,
जब तोहफ़ों की कीमत तय करती है इंसानों की।
जब तोहफ़ों की कीमत तय करती है इंसानों की।।
By Sonal Mathur

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