कहूँ तो कैसे कहूँ
Updated: Dec 5, 2022
By Vani Dayal Sharma
नज़रों करम के लिए तरसती है मुस्तकिल मेरी रूह
कभी तुझे देख के हँस दूँ कभी रो भी दूँ
दिल की दास्ताँ बयाँ करूँ तो कैसे ही करूँ
प्यार है बेइन्तेहाँ तुझसे
ये कहूँ तो कैसे कहूँ |
कभी तेरे दरवाज़े पे यूँ ही आ जाती हूँ
हिम्मत हो कभी तो देहलीज़ पार भी करूँ
चल ये कश्मकश बयाँ कर भी दूँ
पर साँसें चलती हैं सिर्फ तेरे लिए
ये कहूँ तो कैसे कहूँ।
नम आँखों से दिल में झाँक लेता है तू
जितनी खूबसूरत तेरी ख़ामोशी उतनी ही प्यारी गुफ्तगू
जो तू ना कहे वो भी दिल लगा के सुनूँ
अधूरा जाता है दिन बिना तुझे देखे
ये कहूँ तो कैसे कहूँ ।
लफ़्ज़ों से तेरे ही दिन हो मेरा शुरू
बस यही फ़रियाद खुदा से हर दफा करूँ
जब भी करूँ कायनात से दुआ तेरी ही करूँ
बस एक दीदार को तरसती हूँ मैं
ये कहूँ तो कैसे कहूँ ।
दिल छोड़ ईमान तक तेरे नाम कर चुकी हूँ
तेरे ठहराव में बहुँ, तेरी बाहों में रहूँ
नहीं बीतेगा एक पल भी अब तेरे बिना
ये इकरार करूँ तो कैसे करूँ
प्यार है बेइन्तेहाँ तुझसे
ये कहूँ तो कैसे कहूँ ।
By Vani Dayal Sharma

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