कहानी एक कहां होती है !
By Rashmi Prabha
यदि शिव नहीं थे
मां पार्वती नहीं थीं
गणपति, कार्तिकेय के बीच
श्रेष्ठता की बालसुलभ बाजी नहीं थी
तो इतनी सूक्ष्म कल्पना की किसने ?
किसने समुद्र मंथन किया ?
किसने विषपान करके नीलकंठ की प्राण-प्रतिष्ठा की ?
जो भी हो - वंदनीय है !
मां दुर्गा के नौ रूप
क्या सिर्फ कल्पना ही होगी ?
या उस युग में शेरावाली का होना
एक संदेश है,
कि स्त्री की शक्ति - कभी कम नहीं थी
ना ही असुरों की कमी थी
और ना ही उनका संहार नामुमकिन था !
लीक से हटकर पिता के वचन के लिए
राज्याभिषेक होने की तैयारी से निकलकर
राम का वनगमन
वह भी चौदह वर्षों के लिए
नि:संदेह साधारण बात नहीं है।
अपने वनगमन को उन्होंने अपने लिए स्वीकार किया
सीता ने पत्नी धर्म में
लक्ष्मण ने भाई के लिए
अपना साथ दिया ...
अगर मां सीता नहीं जातीं,
तो कौन जाने क्या कथा होती
पर प्रयोजन तो इसी कथा की रही ...
कृष्ण का जन्म, मथुरा से गोकुल
पूतना . . .
कल्पना ही सिहरन दे जाती है ।
कालिया मर्दन किसने देखा आंखों से ?
गोवर्धन पर्वत का उंगली पर उठाना
क्या सिर्फ कपोल कल्पना होगी ?
यदि हाँ, तो किस विश्वास के धागे से बांधने के लिए ?
ज़रुरत क्या थी ? और क्यों ?
चौदह वर्ष बाद फिर से मथुरा जाते कृष्ण की मनोदशा
मात्र चौदह वर्ष के कृष्ण की मनोदशा !!
क्या रही होगी !!!
यशोदा, राधा, नन्द बाबा, गोपिकाएं ...
खो देने की व्यथा
सिर्फ उनके साथ नहीं थी !
सबकुछ खोकर कृष्ण के आगे
कर्तव्यों की रणभूमि थी !!
पराक्रमी कंस को मारना
बायें हाथ का खेल नहीं था
और यदि था
तो वे असाधारण थे !
कहीं न कहीं
हर कहानी में
अतिशयोक्ति के साथ सच भी है
और सच को जानकर अनुमान की गलियों से
प्रत्येक आदमी अपने स्वभाव के अनुसार गुजरता है
सोचता है,सुनाता है, लिखता है
जो आजतक जारी है !
हत्या हो या आत्महत्या
कहानी एक कहां होती है !!!
है न ?
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By Rashmi Prabha

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